जात पीछा नहीं छोड़ती सात समंदर पार भी

जात पीछा नहीं छोड़ती सात समंदर पार भी


 
17 Aug 2020, 12:08:00 AM IST

जाति के आधार पर भेदभाव भारत में आम है। लेकिन अमेरिका में इसने पीछा नहीं छोड़ा है। सात समंदर पार हो रहे हैं चौंकाने वाले मामलेजे सुशील
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कॉरपोरेट दफ़्तर में सूट-बूट पहनकर काम करने वाले पढ़े-लिखे लोग मॉडर्न कहलाते हैं। ख़ास तौर पर विदेश जाकर काम कर रहे हों, तो क्या कहने। उन्हें देखने वाला सोचता है कि दक़ियानूसी ख़याल से तो उनका दूर-दूर तक नाता नहीं होगा। जाति, भेदभाव जैसे शब्द उनकी डिक्शनरी में नहीं मिलते होंगे। बस यहीं आंखें मात खा जाती हैं।

पिछले कुछ वर्षों के शोध और ख़बरों ने बता दिया है कि सात समंदर पार कर लेने या बड़े कॉलेज में पढ़ने के बाद जाति के प्रति नज़रिया नहीं बदल जाता। हाल की घटना जुलाई महीने की है। अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया राज्य में सिस्को कंपनी के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो रही है। दो अधिकारियों पर अपने से छोटे पद पर काम कर रहे कर्मचारी के साथ जाति के आधार पर भेदभाव का आरोप लगा है।

चौंकाने वाली बात यह है कि घटना सिलिकॉन वैली की है। वह जगह जिसके लिए कहा जाता है कि यहां प्रतिभा की कद्र सबसे अधिक होती है। लेकिन वहां पहुंचकर भी कुछ प्रतिभा के धनी भारतीय जाति को साथ लेकर चल रहे हैं।

सिस्को के इस मामले में दलित इंजीनियर ने डिपार्टमेंट ऑफ़ फ़ेयर एंप्लॉयमेंट एंड हाउसिंग से अपील की। जाति का मुद्दा उठा तो विभाग ने कंपनी के ख़िलाफ धर्म, राष्ट्रीय पहचान, जाति या रंग के आधार पर भेदभाव का केस दायर किया। सिस्को के मुताबिक यह मामला दो साल पुराना है, जिस पर कंपनी ने अपने स्तर पर अच्छे से कार्रवाई की थी। लेकिन विभाग ने कंपनी पर भेदभाव का साथ देने और आरोपित अधिकारियों के ख़िलाफ़ उचित कदम नहीं उठाने का आरोप लगाया है।

सिस्को में हुआ यह मामला अपने में अनोखा नहीं है। जाति के आधार पर भेदभाव अमेरिका में लंबे समय से होता आ रहा है। वर्ष 2018 में अमेरिकी स्टार्टअप इक्विटी लैब्स ने सर्वे किया था। उसमें अमेरिका में रह रहे भारतीय दलितों से बातचीत की गई थी। सर्वे के परिणाम चौंकाने वाले थे।


सर्वेक्षण में हिस्सा लेने वाले 25 प्रतिशत दलितों का कहना था कि उनके साथ जाति के आधार पर मौखिक या मारपीट जैसी हिंसा हुई है। हर तीन में से एक दलित छात्र ने पढ़ाई के दौरान भेदभाव का ज़िक्र किया। हर तीन में से दो ने कहा कि दफ्तरों में उनके साथ गलत व्यवहार होता है।

60 फीसदी दलितों ने कहा कि जाति के आधार पर टिप्पणियों या घटिया मज़ाक का उन्होंने सामना किया है। 40 प्रतिशत दलितों और 14 प्रतिशत शूद्र प्रतिभागियों ने कहा कि मंदिरों में जाने में वे असहज महसूस करते हैं। 40 प्रतिशत से अधिक का कहना था कि जाति के कारण उन्हें रोमांटिक पार्टनरशिप में भी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। 

इक्विटीलैब्स का सर्वे जब पहली बार सामने आया, तो कुछ हिंदूवादी समूहों ने इसका विरोध किया था। अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था नैशनल पब्लिक रेडियो की वेबसाइट पर छपी रिपोर्ट के अनुसार, एडवोकेसी ग्रुप हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन के सुहाग शुक्ला ने कहा था, ‘यह ज़रूरी है कि हम जाति आधारित भेदभाव से बाहर निकलें। लेकिन सर्वेक्षण ग़लत तरीक़े से हिंदू धर्म को रख रहा है। उसे विलेन की तरह पेश कर रहा है।’

उस दौरान हुई बहसों में हार्वर्ड के जाने-माने प्रफ़ेसर कोरनेल वेस्ट ने कहा था कि दक्षिण एशिया की जाति व्यवस्था की तुलना अमेरिका के नस्लभेद से की जा सकती है। यह तुलना नई नहीं है। पिछले कई दशकों में अमेरिका के अश्वेत आंदोलन और भारत में दलित आंदोलन एक दूसरे से सीखते रहे हैं। बी आर अंबेडकर और अश्वेत नेता डब्ल्यू. ई. बी. डू बॉयस के बीच इन मुद्दों को लेकर 1940 में चिट्ठियों का आदान-प्रदान हुआ था। बाद में अमेरिका के ब्लैक पैंथर्स की तर्ज़ पर महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स नाम के राजनीतिक दल का भी गठन हुआ।

जाति और रंगभेद की समानता और अंतर की बहस सिस्को के मामले से फिर छिड़ी है। जानकारों की मानें तो इस केस के साथ मुश्किल यह है कि अमेरिकी कानून में दफ़्तर के कामकाज में भेदभाव से जुड़े नियम तो हैं, लेकिन जाति के आधार पर भेदभाव जैसी कोई व्यवस्था नहीं। ऐसा इसलिए कि वहां जाति जैसी कोई चीज़ नहीं है।

जाति को लेकर अमेरिका में पहली बार कोर्ट तक मामला पहुंचा है। इसमें जातिगत भेदभाव को नस्ली भेदभाव का नाम नहीं दिया जा सकता है। इसे देखते हुए वहां की कंपनियां अब अलग से विचार कर रही हैं। सिस्को केस में कोई बड़ा फ़ैसला नहीं भी आया तो आने वाले समय में अमेरिकी कंपनियां जाति आधारित भेदभाव को लेकर अपने कायदे-कानून बना सकती हैं। कर्मचारियों को इसे लेकर जागरूक करना भी प्राथमिकता बन सकती है।

आवाज़ : प्रभात गौड़
*ये लेखक के निजी विचार हैं
 

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